पारगमन प्रभावित क्षेत्र योजना के लिए दिशानिर्देश
परिवहन-उन्मुख विकास के माध्यम से लोगों, स्थानों और...
प्रकृति-आधारित समाधानों (Nature-based Solutions - NbS) के माध्यम से।
राष्ट्रीय शहरी कार्य संस्थान (NIUA) द्वारा अर्बनशिफ्ट इंडिया प्रोग्राम के अंतर्गत, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी (GEF) के सहयोग से तथा सूरत नगर निगम (SMC) और पुडुचेरी योजना प्राधिकरण के साथ साझेदारी में विकसित लचीले तटीय क्षेत्र विकास योजनाओं (Resilient Coastal Zone Development Plans – RCZDPs) की तैयारी के लिए दिशानिर्देश भारत के तटीय क्षेत्रों में जलवायु-सक्षम और सतत विकास की योजना बनाने के लिए एक एकीकृत रूपरेखा प्रदान करते हैं।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं, नीतिगत एवं संस्थागत आकलनों, विषयगत अध्ययनों, प्रारंभिक सर्वेक्षणों तथा डुमस (सूरत), माहे और कराईकल के शहर-स्तरीय अनुभवों के आधार पर, ये दिशानिर्देश लचीली तटीय क्षेत्र विकास योजनाओं को तैयार करने के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। इनका उद्देश्य पारिस्थितिक संरक्षण और शहरी विकास के बीच संतुलन स्थापित करना, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन मजबूत करना तथा समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।
दिशानिर्देशों में लचीले तटीय नियोजन के प्रमुख पहलुओं को शामिल किया गया है, जिनमें तटीय डेटाबेस के माध्यम से जोखिम-आधारित नियोजन, पारिस्थितिकी तंत्र-विशिष्ट प्रकृति-आधारित समाधान (NbS), शासन एवं संस्थागत ढाँचे, वित्तपोषण तंत्र, निगरानी एवं मूल्यांकन, तथा मौजूदा नियोजन प्रक्रियाओं में लचीलेपन के सिद्धांतों का एकीकरण शामिल है। एक अनुकूलनशील रूपरेखा के रूप में तैयार किए गए ये दिशानिर्देश राज्य सरकारों, शहरी स्थानीय निकायों, योजना प्राधिकरणों और संबंधित पेशेवरों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तथा साक्ष्य-आधारित तटीय लचीलापन रणनीतियाँ विकसित करने में सहायता करते हैं। साथ ही, ये दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता और लचीले शहरी विकास को बढ़ावा देने में भी सहायक हैं।